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बिहार में क्या मुस्लिम वोट के बिना भी नीतीश जीत सकेंगे 2020 का चुनाव?

क्या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amendment Bill 2019) का समर्थन कर गलती कर दी? राजनीतिक गलियारों में ये मुद्दा चर्चा का विषय है. कहा जा रहा है कि नीतीश के इस फैसले से मुस्लिम वोटर उनका साथ छोड़ सकते हैं. ये वो वोटर हैं जिनका नीतीश को पिछले दो दशकों से समर्थन हासिल है.

बदल गए नीतीश!

हाल के दिनों तक नीतीश ने मुस्लिम वोटर्स को रिझाने के लिए ट्रिपल तलाक़ और जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का विरोध किया था. ट्रिपल तलाक और आर्टिकल 370 के मुद्दे पर वोटिंग के दौरान दोनों सदनों से उनकी पार्टी के सांसद वॉकआउट कर गए थे. लिहाज़ा नीतीश के रुख में आए अचानक बदलाव को लेकर विपक्ष से लेकर उनकी पार्टी तक के नेता हैरान हैं.

जेडीयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और पूर्व सांसद पवन वर्मा ने नागरिकता संशोधन विधेयक पर नीतीश के फैसले का विरोध किया, लेकिन नीतीश कुमार अपने फैसले पर अड़े रहे और उनके सांसदों ने बिल का दोनों सदनों में समर्थन किया.

क्यों बदल गए नीतीश?

नीतीश के इस रुख से ऐसा लग रहा है कि वो एनडीए में बने रहने के लिए मुस्लिम वोट बैंक को नजरअंदाज़ कर सकते हैं. नीतीश के इस फैसले पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. क्या उन्होंने पीएम मोदी और अमित शाह की आक्रमक जोड़ी के सामने सरेंडर कर दिया. या फिर नीतीश कुमार ने साल 2020 के विधानसभा चुनाव में ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की मंशा से ऐसा किया जिससे कि वो सीएम की पोस्ट सुनिश्चित कर सके.

कभी दोस्त तो कभी दुश्मन

साल 2019 के चुनाव के बाद भी बीजेपी और जेडीयू के बीच अनबन की खबरें आई थी. नीतीश की पार्टी को कैबिनेट में सिर्फ एक सीट मिली थी, लेकिन बाद में नीतीश ने ये पोस्ट ठुकरा दिया. उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी को ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए. इसके बाद से ऐसी अटकलें लगनी शुरू हो गई थी कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियां अलग-अलग हो जाएंगी. उस वक्त बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा था कि दोनों दलों के बीच कोई मतभेद नहीं है. उन्होंने कहा, ‘तलाक (अलग होन) के बाद हम दोनों दल अब काफी करीब आ गए हैं. 2020 का चुनाव हमलोग साथ मिलकर लड़ेंगे.’

पीएम मोदी के साथ नीतीश कुमार

मुसलमानों से दूरियां क्यों?

इस बार के लोकसभा चुनाव में जेडीयू को 17 में से 16 सीटों पर जीत मिली थी. इन सीटों पर उन्हें ज्यादा मुसलमानों का वोट नहीं मिला था. नीतीश ने ऐसा ही प्रयोग बिहार के किशनगंज में किया. यहां उन्होंने AIMIM के खिलाफ मुस्लिम उम्मीदवार को उतारा, लेकिन उनके उम्मीदवार को करारी हार का सामना करना पड़ा.

बिहार के मुसलमान किसके साथ?

जेडीयू के सूत्रों के मुताबिक इस बार लोकसभा चुनाव के दौरान 70 फीसदी मुस्लिमों ने महागठबंधन को वोट दिया, जबकि सिर्फ 6 फीसदी मुसलमानों ने एनडीए को वोट दिया. बिहार में करीब 18 फीसदी मुस्लिम वोट हैं और ये सब 1990 से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को ही वोट देते हैं. इस बार भी जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटने और सीटीज़नशीप संशोधन कानून आने के बाद बिहार में मुस्लिम वोटर RJD के साथ ही रहेंगे.

जब कांग्रेस से दूर हुए मुसलमान

बिहार में 1970 के दशक से ज़्यादातर मुसलमान कांग्रेस के साथ रहे हैं. इन सबने बिहार में कांग्रेस के लिए मुस्लिम-ब्राह्मण-दलित वोटरों का वोट बैंक तैयार किया था. 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के बाद बिहार में मुसलमानों की राजनीति में बदलाव का दौर शुरू हुआ. उन दिनों उर्दू भाषी बिहारी प्रवासियों की कई जगह हत्याएं हुई थी. इन्ही दिनों गुलाम सरवर, तक़ी रहीम, जफ़र इमाम और शाह मुश्ताक जैसे नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया और मुसलमानों के बीच कांग्रेस विरोधी भावनाओं को जगाया. जेपी आंदोलन ने मुस्लिम मानस पर भी अपना प्रभाव डाला, जिसके कारण 1977 में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में जनता सरकार बनी.

लालू के साथ मुस्लिम

1989 के भागलपुर दंगों के बाद, मुसलमानों ने एक बार फिर कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया, जिसके कारण लालू प्रसाद के नेतृत्व में बिहार में जनता दल की सरकार बनी. लालू ने 15 वर्षों तक बिहार पर शासन किया. लालू को मुस्लिम-यादव फॉर्मूले का फायदा मिला. लालू ने उन दिनों मंडल आयोग की सिफारिशों के मुताबिक पिछड़ी मुस्लिम जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया था.

नीतीश ने कैसे जीता था मुसलमानों का दिल?

साल 2005 में चुनाव से ठीक पहले मुसलमानों के कमज़ोर वर्ग ने जेडीयू को समर्थन दिया. इसके अलावा पिछड़ी जाति के मुस्लिम और अति पिछड़ी जातियां जैसे लालबेगिस, हलालखोर और मेहतर ने अली अनवर के नेतृत्व में जद (यू) का समर्थन किया. विधानसभा चुनावों में वोटिंग के पैटर्न ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि मुसलमान बीजेपी प्रत्याशियों का समर्थन नहीं करते थे, लेकिन जद (यू) प्रत्याशियों को प्राथमिकता देते थे, जिन्हें वे धर्मनिरपेक्ष मानते थे.

जेडी (यू) ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा शुरू की गई कई अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के साथ मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जा किया. कुमार ने अल्पसंख्यकों के बीच एक जगह बनायी, और भागलपुर जैसे कुछ क्षेत्रों में, कुख्यात भागलपुर दंगा मामलों को फिर से खोलने और जांच के लिए एनएन सिंह आयोग किया. इसके बाद उन्होंने लालू को चुनौती दी.

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