पॉलिटिक्स

नागरिकता संशोधन विधेयक पर शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों ने क्या कहा…

धर्म के आधार पर बंटवारा तब हुआ था, जब हिंदुस्तान की जमीन पर खून से सीमाएं खींच दी गईं। उस वक्त हिंदू-मुस्लिम की राजनीति नहीं होती तो लोग अपने घरों में होते। आज जब वर्षों बाद हिंदुओं को उनका अधिकार मिल रहा है तो फिर ये विरोध क्यों? ये कहना है 70 वर्षीय उस बुजुर्ग लक्ष्मी देवी का, जो तीर्थयात्रा के बहाने से अपने परिवार सहित पाकिस्तान के सिंध से भारत आईं। वे उन 120 हिंदू परिवारों के साथ मजनूं का टीला स्थित शरणार्थी शिविर में रह रही हैं, जो पाकिस्तान से भागकर अपने वतन वापस आए हैं। शरीर से लाचार और अभाव की जिंदगी जी रहीं लक्ष्मी देवी का कहना है कि न उन्हें गद्दा चाहिए, न खाना। न घर चाहिए और न ही नौकरी। उन्हें बस अपना वतन चाहिए, और कुछ नहीं। 800 लोगों की आबादी वाले इस शिविर में नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 का पूरी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया जा रहा है।
इसी शिविर से चंद कदम आगे तिब्बती शरणार्थियों का रिहायशी इलाका है, जहां हर कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताते हुए नागरिकता संशोधन विधेयक का स्वागत कर रहा है। यहां ज्यादातर बौद्घ धर्म के अनुयायी रहते हैं। वहीं कुछ जैन और ईसाई धर्म के अनुयायी भी आसपास रहते हैं।
ठीक इसके विपरीत कालिंदी कुंज इलाके में स्थित रोहिंग्या मुस्लिमों के शिविर में लोग डरे-सहमे से हैं। बर्मा से भागकर यहां तक पहुंचे ये लोग अब अपने देश वापस जाना नहीं चाहते हैं। अमर उजाला ने जब इनसे पूछा कि राज्यसभा में विधेयक पारित हो गया तो क्या आप अपने वतन वापस जाना चाहेंगे? तो इनका जवाब था, मर जाएंगे, लड़ जाएंगे पर अपने देश वापस नहीं जाएंगे। बर्मा की लड़ाई से अपने परिवार को बचाने के लिए वे भागकर आए थे। उन्होंने वहां उस मंजर को देखा है जब अपनों की सरेआम हत्या कर दी गई थी, इसलिए वे सरकार से अपील कर रहे हैं कि उन्हें भारत में ही रहने दिया जाए। ये लोग पिछले 6 से 8 वर्ष से यहां रह रहे हैं।

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