राष्ट्रीय समाचार

कश्मीर में सरकार के वादों की हक़ीक़त

इसी साल जून 2019 में भारत सरकार ने ‘बैक टू विलेज’ नाम से एक अभियान की शुरुआत की थी. जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों को गांव में लोगों के पास जाना होता है और उनकी मांगों को सुनकर पंचायत के विकास पर काम करना होता है.ग़ुलाम मोहम्मद कहते हैं, ” ‘बैक टू विलेज’ के पहले चरण में जब सरकारी अधिकारी हमारे गांव आए थे तब हमने उनके सामने अपनी मांगें रखी थीं. उन्होंने बड़े-बड़े दावे भी किए थे. लेकिन उसके बाद भी ज़मीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ है.”

यहां पर सड़कें ख़स्ताहाल हैं. बारिश और बर्फ़बारी के वक़्त ये सड़कें गाड़ियां चलाने लायक नहीं रहतीं. सर्दियों के मौसम में हमारे गांव में जम कर बर्फ़ पड़ती है. हमने सड़क दुरुस्त करने के अलावा एक स्वास्थ्य केंद्र और एंबुलेंस की मांग भी की थी. लेकिन ये सभी मांगे अब तक कागज़ों पर ही हैं.”

“मैं चुनौती दे सकता हूं कि एक भी मांग को पूरा नहीं किया गया है. वो लोग यहां आए, काग़ज़ों पर हमारी मांगें लिखीं और फिर ग़ायब हो गए. ज़िले के डिप्टी कलेक्टर भी हमारे गांव आए थे, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं हुआ.”

कुलगाम के नंदीमार्ग गांव जाने वाली सड़क पर गाड़ियों को कई तरह की मुश्किलें आती हैं, उन्हें बार-बार थोड़ा आगे और पीछे जाकर अपना रास्ता बनाना पड़ता है क्योंकि सड़क में फिसलन अधिक होती है और इस कारण लोगों की जान को भी ख़तरा होता है.

एक वक़्त में दो गाड़ियां रास्ता पार नहीं कर सकतीं क्योंकि सड़क पर इतनी जगह अब बची ही नहीं है.

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