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राज्यसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरु

भोपाल, छ: साल के अंतराल मे होने जा रही मध्य प्रदेश की तीन राज्य सभा सीटों पर चुनाव के लिए तैयारी शुरू हो गई है. इसके लिये विधानसभा के प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह को चुनाव के लिए रिटर्निंग अफसर नियुक्त कर दिया गया है.
चुनाव की अधिसूचना जनवरी के पहले हफ्ते में जारी होने की उम्मीद है. 9 अप्रैल 2020 में तीन राज्य सभा सांसद कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और भाजपा के प्रभात झा व सत्यानारायण जटिया का कार्यकाल पूरा हो रहा है. इसलिए चुनाव आयोग ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं.

विधानसभा मे संख्या बल के आधार पर इस बार दो सीटों पर कांग्रेस के सदस्य चुने जाना हैं. कांग्रेस से कई दिग्गजों के नाम रेस में चल रहे हैं. दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की चर्चा निवृत्तमान हो रहे राज्यसभा सदस्य और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है. इसके अतिरिक्त पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन एवं मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए विधानसभा की सीट खाली करने वाले छिंदवाड़ा के विधायक दीपक सक्सेना का नाम भी रेस में शामिल बताया गया है.

पार्टी नेताओं के बीच मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की वरिष्ठता को देखते हुए पार्टी हाईकमान एक बार फिर उन्हें अवसर दे सकती है. बताया जाता है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ भी पूरी तरह से इस मामले में दिग्विजय सिंह के साथ हैं क्योंकि सरकार बनते ही जब मुख्यमंत्री बनाने की बात सामने आई तो दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ का पुरजोर समर्थन किया था.

जहां तक ज्योतिरादित्य सिंधिया की बात है तो उन्हें लेकर प्रदेश में दो विकल्प देखे जा रहे हैं उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की दौड़ में भी अग्रणी माना जा रहा हैं और इसे लेकर उनके समर्थक मंत्री और विधायक भी लगातार बयानबाजी के साथ ही लाबिंग भी कर रहे हैं. यदि किन्ही राजनीतिक कारणों के चलते सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया जाता तो उनको राज्यसभा में भेजने के निर्णय को भी पार्टी हाईकमान द्वारा मुहर लगाई जा सकती है.

एक अनार सौ बीमार: केंद्र में सरकार होने के कारण भाजपा में राज्यसभा सदस्य को लेकर पार्टी में होड़ मची हुई है. दावेदारों की लंबी फेहरिस्त को देखते हुए एक अनार सौ बीमार की स्थिति निर्मित होती जा रही है. राज्यसभा सदस्यता से निवृत्त होने जा रहे पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और पार्टी के ही राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को प्रबल दावेदारों के रूप में देखा जा रहा है.

जहां तक प्रभात झा का सवाल है वह पूर्व में मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं और इस बार भी उनकी इसी पद के लिए दावेदारी मानी जा रही है. यदि किन्हीं कारणों से उन्हें पुन: प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया जाता और राष्ट्रीय राजनीति में ही सक्रिय रखा जाता है तो उन्हें फिर से राज्यसभा में भेजा जा सकता है. दूसरी ओर कैलाश विजयवर्गीय वर्तमान में संगठन के शीर्ष नेताओं के बेहद करीब और विश्वासपात्र माने जाते हैं. उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ भाजपा के लिए महत्वपूर्ण समझे जाने वाले राज्य पश्चिम बंगाल का संगठन प्रभारी भी बनाया गया है.

पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने यहां से 18 सीटों पर लोकसभा चुनाव जीतकर विजयवर्गीय के प्रयास को प्रमुख माना था. अब यदि आने वाले विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में पार्टी के आधार को मजबूत करना है तो विजयवर्गीय की सेवाओं को निरंतर जारी रखा जा सकता है.

वे वर्तमान में किसी भी सदन के निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं हैं ऐसी दशा में उन्हें पश्चिम बंगाल में पार्टी के लिए काम करते समय कई वैधानिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उन पर हमले तक हो चुके हैं काफिले को पुलिस द्वारा रोकना कार्यक्रमों के लिए अनुमति नहीं देना जैसी घटनाएं भी हो चुकी हैं. ऐसी दशा में उन्हें उच्च सदन में भेजकर पार्टी उनके काम को सरल बना सकती है. इसलिए उन्हें सबसे ज्यादा प्रबल दावेदार माना जा रहा है.

इसके अतिरिक्त लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजन एवं लंबे समय से संगठन में दायित्व निभा रहे डॉक्टर दीपक विजयवर्गीय भी दौड़ में शामिल हैं. पिछले चुनाव हारने वाले पूर्व मंत्रियों में उमाशंकर गुप्ता, डॉ. गौरीशंकर शेजवार और जयंत मलैया जैसे भाजपा नेताओं के नाम भी राज्यसभा सदस्य की दौड़ में गिनाए जा रहे हैं.

कांग्रेस की राह आसान
प्रदेश में रिक्त होने वाली तीन सीटों में से भाजपा के पास दो और कांग्रेस के पास एक सीट है. लेकिन 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद समीकरण बदल गए हैं. विधानसभा की मौजूदा सदस्यों की संख्या के मुताबिक कांग्रेस की राह आसान दिख रही है. राज्य सभा सदस्यों के चुनाव में प्रत्याशी को जीत के लिए 58 विधायकों के वोटों की जरूरत होती है. कांग्रेस के पास अभी 114 विधायक हैं, लेकिन कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के मंत्रिमंडल में एक निर्दलीय विधायक है.

तीन निर्दलीय कांग्रेस विचारधारा के हैं और सरकार को समर्थन भी दे रहे हैं. इसी तरह बसपा के दो और सपा का एक विधायक भी कमलनाथ सरकार को समर्थन कर रहे हैं. कुल मिलाकर कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के पास 121 विधायकों का समर्थन है. वहीं, भाजपा के 108 विधायक हैं. ऐसे में कांग्रेस के दो प्रत्याशियों की राज्यसभा चुनाव में जीत आसान है.

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