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बारहसिंगा का क्या क़सूर था, जो उसे मिली एसी मौत।

अमृतसर. खुद को बेजुबानों का रक्षक बताने वाले जंगलात विभाग ने बुधवार को भटककर कंपनी बाग में पहुंचे बारहसिंगे का ‘कत्ल’ कर दिया। बाग में बारहसिंगे के पहुंचने की खबर मिलने पर उसे पकड़ने के लिए डंडा-रस्सा लेकर आई जंगलात विभाग की टीम उसे दो घंटे तक इसलिए भगाती रही, ताकि वो थककर खुद ही रुक जाए। बाग में लोहे की ग्रिलों पर दौड़ते समय बारहसिंगे को गंभीर चोटें लग गई। इसके बावजूद टीम उसे भगाती रही। आखिरकार जब उसके पास कदम उठाने तक ही हिम्मत नहीं रही तो वह निढाल होकर जमीन पर गिर गया। इसके बाद रस्से से बांधकर उसे अस्पताल पहुंचाया गया, मगर कुछ पलों के बाद ही उसने दम तोड़ दिया। इससे पहले जंगलात विभाग की टीम तड़के साढ़े 4 बजे सूचना देने के बावजूद साढ़े 7 बजे बिना किसी प्लानिंग के मौके पर पहुंची। टीम के पास न तो ट्रैंक्यूलाइजर गन और न ही कोई जाल था।

सबसे पहले बारहसिंगा को देखने वाले एएसआई नरिंदर कुमार ने बताया कि वह रात 2.15 बजे पैट्रोलिंग पर थे। उन्होंने बारहसिंगे को कंपनी बाग में देखा। सुबह भीड़ बढ़ने और लोगों को देखने के बाद बारहसिंगा थोड़ा बेचैन होकर इधर-उधर भागने लगा था। सुबह साढ़े 4 बजे उन्होंने साेसायटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी लच एनिमल (एसपीसीए) के इंस्पेक्टर अशोक जोशी को इसकी सूचना दी। कंपनी बाग के चारों ओर लगी 7-7 फीट की ग्रिलों में फंसकर बारहसिंगा पहले ही जख्मी हो गया था।

एसपीसीए के अशोक जोशी ने बताया कि सुबह 4.30 बजे उन्होंने जंगलात विभाग को फोन कर दिया था, लेकिन उनकी टीम 7.30 बजे कंपनी बाग में पहुंची। रेस्क्यू के लिए पहुंची जंगलात विभाग की टीम के पास सिर्फ रस्सी थी और प्लानिंग के नाम पर वो शून्य थे। दो घंटों तक उन्होंने इसे इसलिए भगाया, ताकि थककर वह खुद ही बैठ जाए। टीम ने 9.30 बजे बारहसिंगे को काबू कर लिया गया और उसकी आंखों पर पट्टी बांध उसे वेरका अस्पताल ले गए। वहां जाते ही उसने दम तोड़ दिया। जंगलात विभाग इसे अपनी गलती नहीं मान रहा। उनका कहना है कि बारहसिंगा पहले से ही चोटिल हो गया था, लेकिन चश्मदीदों के अनुसार बारहसिंगा सुबह 7.30 बजे भी पुरी तरह से चुस्त था और दो घंटों तक जंगलात विभाग ने उसे भगा-भगाकर मार डाला।

हर बार रस्से के सहारे होता रेस्क्यू एसपीसीए के इंस्पेक्टर अशोक जोशी ने बताया कि उनकी संस्था जानवरों को बचाने का काम करती है। कई बार बड़े जानवर शहर में आ जाते हैं और वह उन्हें रेस्क्यू करने के लिए जंगलात विभाग को सूचना देते हैं, लेकिन दुख होता है कि उनके पास उन्हें रेस्क्यू करने के लिए कुछ नहीं होता। हर बार रस्से के सहारे बेजुबान जानवरों को पकड़ने का प्रयास होता है। बारहसिंगा पहले से घायल था, लेकिन वह चुस्त था। दो घंटे तक उसे भगा-भगाकर थकाना, एक जानवर के अधिकारों का हनन है। कई बार जंगलात विभाग को ट्रैंक्यूलाइजर गन खरीदने के लिए बोला गया है। मौत के बाद बारहसिंगे को मेन ब्रांच केनाल के पास दबा दिया गया है।

ट्रैंक्यूलाइजर गन 600 मीटर दूर से लगा सकती है बेहोशी का इंजेक्शन 

ट्रैंक्यूलाइजर गन की सहायता से 200 से 600 मीटर की दूरी से ही जंगली जानवर को बेहोशी का इंजेक्शन दिया जा सकता है, लेकिन इसे हर कोई नहीं चला सकता। अगर इस गन को कोई अनट्रेंड कर्मचारी चलाए तो इससे न केवल जानवर, बल्कि खुद कर्मचारी को भी जान का खतरा हो सकता है।

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