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गिद्धों के लिए दवा ही बनी जहर, चार करोड़ से घटकर रह गए महज 4 लाख

अगर यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब भारत में गिद्धों की सिर्फ कहानियां ही सुनने को मिलेंगी। पिछले तीन दशक में इस पक्षी की संख्या इतनी ज्यादा गिर चुकी है कि यह लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सोमवार को चिंताजनक आंकड़े पेश करते हुए बताया कि गिद्धों की संख्या तीन दशक में चार करोड़ से घटकर चार लाख से भी कम रह गई है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण (सीएमपी) कार्यक्रम के आयोजन को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा ‘डाइक्लोफेनेक’ की वजह से गिद्धों की मौत हुई क्योंकि वे मृत जानवरों को खाते हैं। उन्होंने बताया कि ‘डाइक्लोफेनेक’ उनकी मांसपेशियों में जमा हो जाती है। जब पशुओं की मौत होती है तो गिद्ध उन्हें खाते हैं और फिर यह दवा गिद्धों के शरीर में पहुंचकर उनकी मौत का कारण बन जाती है।

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