पॉलिटिक्स

Many messages will come out of delhi assembly election 2020

नए साल की शुरुआत देश की राजधानी दिल्ली में सियासी दंगल से हो सकती है। यहां विधानसभा चुनाव के लिए बिसात बिछ चुकी है। 2015 विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। तब आम आदमी पार्टी राज्य की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर जीती थी। बाकी तीन सीटें बीजेपी ने जीती थीं और कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी। अब बीजेपी यहां 2015 का बदला लेने को उतरेगी तो कांग्रेस अपना खोया हुआ जनाधार पाने के लिए। इन दोनों के बीच अरविंद केजरीवाल आम चुनाव में करारी हार के बाद यह साबित करने उतरेंगे कि दिल्ली की स्थानीय राजनीति में उनकी पकड़ कम नहीं हुई है। इनके बीच होने वाले इस चुनाव का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा। दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा अब कभी भी हो सकती है। चुनाव आयोग के मुताबिक सभी तैयारियां कर ली गई हैं और अब इसकी घोषणा करने भर की औपचारिकता निभानी है। सूत्रों के अनुसार आयोग 5 से 10 फरवरी के बीच के किसी दिन पर विचार कर रहा है। वोटिंग एक ही चरण में होगी। आयोग अगले हफ्ते चुनाव की तारीखों की घोषणा कर सकता है। तारीखों की घोषणा के साथ ही आचार संहिता प्रभावी हो जाएगी। पिछली बार दिल्ली में चुनाव 7 फरवरी को हुए थे और परिणाम 10 फरवरी को आए थे। दिल्ली मॉडल ऑफ डिवेलपमेंट अरविंद केजरीवाल के लिए दिल्ली विधानसभा खुद उनके और उनकी पार्टी के लिए लगभग अस्तित्व की लड़ाई है। यह दोनों के लिए आगे की राह तय करेगी, जिसका राष्ट्रीय राजनीति से सरोकार हो सकता है। 2014 में दिल्ली में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय राजनीति में उतरने की हसरत सामने आई। वे 2014 आम चुनाव में उतरे और बुरी तरह विफल हुए। 2015 में दिल्ली के चुनाव ऐतिहासिक रूप से जीतने के बाद दोबारा उनकी यह हसरत सामने आई और आम आदमी पार्टी पंजाब विधानसभा सहित कई राज्यों में उतरी। पंजाब में तो पार्टी ने कुछ चुनौती दी, लेकिन दूसरे प्रदेशों में विस्तार की उसकी योजना पूरी तरह विफल रही। इन सबके बीच दिल्ली एमसीडी चुनाव में आम आदमी पार्टी की करारी हार हुई। इन पांच सालों में केजरीवाल सरकार कई विवादों और आरोपों में भी फंसी। कई पुराने नेता पार्टी छोड़कर चले गए। 2019 आम चुनाव में एक बार फिर से आम आदमी पार्टी बुरी तरह हारी। हालांकि कहा गया कि दिल्ली राजनीति में उनकी पकड़ बनी हुई है।

अब अगर वह इसे साबित करने में सफल हो गए तो एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में आने की उनकी कोशिश शुरू हो सकती है। जानकारों के अनुसार चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ने के पीछे उनकी मंशा भी यही है। दिल्ली मॉडल ऑफ डिवेलपमेंट और पांच सालों के शासन की बदौलत वह खुद को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करने की दोबारा कोशिश कर सकते हैं, जिसमें उन्हें दूसरे क्षेत्रीय दलों का सपोर्ट मिल सकता है। लेकिन अगर दिल्ली में वह अपनी जमीन बचाने में विफल हो जाते हैं तो फिर आगे की उनकी राह कठिन हो जाएगी। इसका अहसास उन्हें भी है। यही कारण है कि पिछले एक साल से उन्होंने खुद को पूरी तरह दिल्ली की राजनीति तक ही सीमित रखा और अपने दिल्ली मॉडल ऑफ डिवेलपमेंट की बात की, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और बिजली जैसे मुद्दों पर अपने काम गिनाए। बीच में फंसी है बीजेपी बीजेपी की भी अपनी चिंताएं हैं। आम चुनाव के बाद राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए बहुत अच्छे नहीं रहे। महाराष्ट्र में उसने सरकार गंवाई। हरियाणा में उसे गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी। अब झारखंड में मिली हार के बाद पार्टी दिल्ली को लेकर चिंतित है। सर्वे में भले ही बीजेपी आम आदमी पार्टी को टक्कर देती दिख रही है, लेकिन दिल्ली का सबसे लोकप्रिय नेता अरविंद केजरीवाल को बताया जा रहा है। ऐसे में स्थानीय चेहरों के अभाव में दिल्ली बीजेपी को यहां भी नैया पार लगाने के लिए मोदी के रूप में ‘महाचेहरे’ की जरूरत हो सकती है। पार्टी अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि उसे इस बार दिल्ली में सीएम का चेहरा देना है या नहीं। इसके पीछे कारण यह भी है कि पार्टी अभी तय नहीं कर पाई है कि दिल्ली चुनाव वह लोकल मुद्दों पर लड़ेगी या राष्ट्रीय मुद्दों पर।

पार्टी को पता है कि पीएम नरेंद्र मोदी के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम देखते हुए चुनाव प्रचार में उनकी रैली के लिए वक्त निकालना कठिन होगा। सूत्रों के अनुसार दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी नागरिकता संशोधन कानून को मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है। वैसे अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने का श्रेय लेने में भी बीजेपी आम आदमी पार्टी से होड़ लगा रही है। वह कोई भी मोर्चा आम आदमी पार्टी के लिए नहीं छोड़ना चाह रही। उसे पता है कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम बाकी राज्यों में धारणा बना-बिगाड़ सकते हैं। 2015 में भी ऐसा ही हुआ था। तब दिल्ली में बीजेपी हारी और साल के अंत में बिहार हारी थी। अपनी जगह खोजती कांग्रेस उधर दिल्ली चुनाव कांग्रेस के लिए एक बार फिर से नई चुनौती लाएंगे। सालों बाद कांग्रेस शीला दीक्षित के बिना दिल्ली में उतरेगी। पार्टी पिछले कुछ चुनावों में यहां नंबर तीन पर जा चुकी है। गुटबाजी और दिशाहीनता पार्टी को नुकसान दे चुकी है। इस बार कांग्रेस दिल्ली चुनाव में संदेश देना चाहेगी कि उसे खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन अगर वह बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच जगह नहीं बना पाई तो राष्ट्रीय राजनीति में उस पर क्षेत्रीय दलों का दबाव और बढ़ जाएगा

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