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Kashmir: जावेद अहमद टाक के जज्बे को सलाम, गोलियां झेलने से पद्मश्री पुरस्कार पाने तक !

[: जम्मू, नवीन नवाज। आतंकियों ने मुझेेेेे गोलियों ने भून दिया और मुझेेेेे मरा हुआ समझकर वहां से चले गए, लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था। मैं बच गया। हां, ताउम्र के लिए दिव्यांग हो गया। मैं अपनी जिंदगी से हार मान चुका था, लेकिन एक ऐसा पल आया, जिसने मेरी जिंदगी के मायने ही बदल दिए। तब मैंने दिव्यांगों और आतंक पीड़ितों की मदद को अपना मिशन और मकसद बना लिया। इस तरह शुरू हुआ जेबा आपा इंस्टीट्यूट। इस स्कूल में आठवीं कक्षा तक के करीब 100 दिव्यांग, मूक-बधिर, नेत्रहीन, गरीब और आतंक पीड़ित बच्चों को निश्शुल्क शिक्षा दी जाती है..।

गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित

गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण कश्मीर के बिजबिहाड़ा निवासी जावेद अहमद टाक ने अपने जीवन के 23 साल के संघर्ष की कहानी बयां की। टाक ने अपने साथ हुए हादसे का जिक्र करते हुए बताया, यह वर्ष 1997 में 21-22 मार्च की मध्यरात्रि की बात है। तब मैं 21 वर्ष का था और स्नातक कर रहा था। अपनी बीमार मौसी के घर आया था। रात को अचानक वहां बंदूकधारी (आतंकी) आए। वह मेरे मौसेरे भाई को अगवा कर ले जाने लगे। मैंने रोका तो उन्होंने गोलियां चला दीं। अगले दिन अस्पताल के बिस्तर पर मेरी आंख खुली। कुछ ही दिनों बाद मैं घर आया, लेकिन हमेशा के लिए दिव्यांग बनकर। गोलियों ने मेरी रीड़ की हड्डी, जिगर, किडनी, पित्ताशय, सबकुछ जख्मी कर दिया था। तीन साल तक बिस्तर पर रहा। तनाव का शिकार हो गया।

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