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Exodus of Kashmiri Pandit: रातों रात अपनी जमीन को छोड़ने का दर्द वहीं जानता है जिसने इसे देखा हो

[: कश्‍मीरी पंडितों को अपनी जमीन छोड़े तीन दशक बीत चुके हैं। 1990 में जब कश्‍मीर में आतंकवाद ने अपने पांस पसारने शुरू किए तब से ही हर दिन इन लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन गया। आतंकवाद ने इन लोगों को अपनी जमीन को रातों-रात छोड़ने पर मजबूर कर दिया। जिसके हाथ जो लगा वो उसको ही लेकर अपनी और अपने परिवार की जान बचाने के लिए अपना घर छोड़ कर रातों-रात कूच कर गया। इस चक्‍कर में कईयों के कई अहम दस्‍तावेज तक वहीं पर छूट गए। जिस घर में उन्‍होंने अपना बचपन बिताया या उनके बच्‍चों के होने की किल‍कारियां गूंजीं और जहां इनके बाप-दादा ने आखिरी वक्‍त गुजारा उसको रातों-रात छोड़ने का दर्द इनके अलावा कोई दूसरा नहीं जान सकता। तीन दशक गुजरने के बाद भी इन्‍हें अपनी जमीन खोने का दर्द आज भी सालता है। साथ ही इन्‍हें उम्‍मीद है कि एक दिन ये अपने उसी घर में वापस जाएंगे जहां से ये तीन दशक पहले बिछड़े थे। 19 जनवरी को कश्‍मीरी पंडित विस्‍थापन दिवस के रूप में मनाते हैं। हाल ही में रिलीज फिल्‍म ‘शिकारा’ भी इन्‍हीं लोगों की जिंदगी की कहानी को बयां करती है। लेकिन इस कहानी से दूर इन लोगों का दर्द काफी कुछ और भी कहता है। इनका कहना है कि जिस पर बीतती है उसका दर्द भी वही जानता है। इस मौके पर हमने भी जम्‍मू-कश्‍मीर से अपना घर छोड़कर आए कुछ लोगों से उनका दर्द साझा करने की कोशिश की

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