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CAA विरोध से मोदी की किस अहम नीति को झटका

: बांग्लादेश सरकार के वाणिज्य मंत्री टीपू मुंशी ने तीन महीने पहले 23 अक्तूबर को गुवाहाटी में आयोजित भारत-बांग्लादेश स्टेकहोल्डर्स की बैठक में कहा था कि असम और बांग्लादेश गारमेंट, स्वास्थ्य पर्यटन, आईटी और शिक्षा के क्षेत्र में अब साथ काम करेंगे.
लेकिन इस बात के महज कुछ दिन बाद ही असम तथा पूर्वोत्तर के राज्यों में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन को देखते हुए बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज्जमां ख़ान को अपनी भारत यात्रा रद्द करनी पड़ी.
इससे पहले बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमिन ने भी अपना भारत दौरा रद्द कर दिया. असम में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों और असम की चिंताजनक स्थिति को ध्यान में रखते हुए जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे को भी भारत दौरा रद्द करना पड़ गया.
शिंज़ो आबे का दौरा पिछले 15 दिसंबर से 17 दिसंबर तक के लिए प्रस्तावित था और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात पूर्वोत्तर राज्य असम के गुवाहाटी में होनी थी.
नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ असम तथा पूर्वोत्तर राज्यों में हो रहे विरोध प्रदर्शन को देखते हुए फ्रांस, अमरीका, ब्रिटेन, इसराइल, कनाडा और सिंगापुर समेत कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है और असम न जाने की सलाह दी है.
पूरब की ओर देखो नीति’ क्या है?

दरअसल, असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में चरमपंथी संगठनों की गतिविधियों के कारण लंबे समय तक अशांति का माहौल रहा है.
ऐसे में भारत का ये ख़ूबसूरत इलाक़ा मुख्यधारा के राज्यों से कई स्तर पर पीछे रह गया.
इस क्षेत्र को विकसित करने और मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र में आई कई सरकारों ने अलग-अलग योजनाओं के ज़रिए प्रयास शुरू किए.
भारत की पूरब की ओर देखो नीति अर्थात लुक इस्ट पॉलिसी वर्ष 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने शुरू की थी.
इस नीति का मुख्य लक्ष्य भारत के व्यापार की दिशा को पश्चिमी देशों से हटाकर उभरते हुए दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों की ओर ले जाना था.
साथ ही भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और पड़ोसी देशों बीच मधुर संबंध विकसित करना था ताकि व्यापार-वाणिज्य के ज़रिए इस क्षेत्र का विकास किया जा सके.
वहीं पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान 2004 में पूर्वोत्‍तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (डोनर) नाम से एक अलग मंत्रालय का गठन किया गया.
लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों के विकास पर क़रीब से नज़र रखने वाले लोगों का यह मानना है कि इस क्षेत्र में जिस प्रभावी तरीक़े से काम किया जाना था उतना किया नहीं गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा था कि वो पूर्वोत्तर भारत को एक द्वार की तरह विकसित कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ”नॉर्थ इस्ट इंडिया को हम साउथ इस्ट एशिया के गेटवे के तौर पर डेवेलप कर रहे हैं. भारत का ये हिस्सा हमारी एक्ट इस्ट पॉलिसी और थाइलैंड की एक्ट वेस्ट पॉलिसी, दोनों को ताक़त देगा.”
लेकिन नागरिकता संशोधन क़ानून और इनर लाइन परमिट को लेकर पिछले कुछ दिनों से असम तथा पूर्वोतर के कई राज्य में हो रहें विरोध से उत्पन्न अशांति के माहौल ने सरकार के प्रयासों को कमज़ोर किया है.
ऐसे में सवाल उठते है कि पूर्वोत्तर भारत में शांति स्थापित किए बिना इस इलाक़े को साउथ इस्ट एशिया के गेटवे के तौर विकसित करना कहां तक संभव होगा?

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