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Budget 2020-21: हांफ रही अर्थव्‍यवस्‍था का मर्ज समझकर लगाना होगा मरहम, करने होंगे ये उपाय

[ गरीबी मिटाने और गरीबों को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करने के लिए अर्थव्यवस्था को नौ फीसद की दर से बढ़ाना होगा। ये बात केंद्रीय वित्तमंत्री अच्छी तरह जानती हैं। लेकिन बजट का दिन उनके लिए आसान नहीं होने वाला। विभिन्न सेक्टर के लिए खर्च और आवंटन की सरकार की मंशा बजट से पारिभाषित होती है। हर आर्थिक भागीदार इसे समझता है। भारत की अर्थव्यवस्था सुस्‍ती के दौर से गुजर रही है। कुछ दीर्घ और सूक्ष्म स्थितियां मंदी को और तेज कर रही हैं। ये बातें अतिशयोक्ति लग सकती हैं लेकिन यहां कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
[18 दीर्घ संकेतांकों के अध्ययन का निचोड़ यह है कि इनमें से 11 तो पांच साल के औसत में सबसे निचले स्तर पर हैं। उपभोक्ताओं से जुड़े क्षेत्रों के कमजोर संकेत औद्योगिक क्षेत्र को भी प्रभावित कर रहे हैं। आधारभूत संकेतक जैसे मूल्य संकेत (मांग बनाम आपूर्ति) भी गिर रहे हैं। इसी तरह, आर्थिक वृद्धि के चार स्तंभ निजी निवेश, सरकारी व्यय, घरेलू उपभोग और निर्यात की स्थिति भी बदतर होती जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था उपभोक्ता आधारित है। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 60 फीसद का योगदान देती है। लेकिन यह हांफ रही हैं।
रियल स्टेट की स्थिति भी डावांडोल
तीन सौ सहायक उद्योगों को जोड़ने वाले रियल स्टेट की स्थिति भी डावांडोल है। ऑटो सेक्टर उबड़-खाबड़ रास्ते पर है। इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति भी ठीक नहीं है। सरकार इन्कार की मुद्रा में बिल्कुल नहीं हैं। जीएसटी, आइबीसी, डिजिटाइजेशन जैसे सुधारात्मक कदम अच्छे हैं लेकिन इनका फायदा नहीं दिख रहा। वैसे यह आने वाले कल की बात है, और उससे पहले आज है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह इकॉनामिक इकोसिस्टम को उद्यमियों के अनुकूल बनाएं। किसानों को सहायता दें और गरीबों का जीवन स्तर सुधारें।
आशा से समृद्ध होती है अर्थव्यवस्था
अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए समग्र नीतिगत ढांचे और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र जरूरी है जो विनियामक मंजूरी, कड़ी प्रक्रियाएं, समान भूमि अधिग्रहण, शीघ्र कार्यान्वयन, नवाचार को बढ़ावा और परिणामों को बढ़ावा देने में सक्षम बनाए। बोझिल विनियमन, खराब नीति, इंस्पेक्टर राज, जांच और गहन निगरानी से विकास कार्य बाधित होता है। प्रचलित श्रम कानून, जटिल कर संरचना और नौकरशाही के झंझट केवल प्रतिस्पर्धा में बाधक बनते हैं। वित्तमंत्री को चाहिए कि वे युवाओं को आशा दें।

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