पॉलिटिक्स

नीतीश के चेहरे पर भाजपा उठा रही सवाल या फिर एनडीए में बिखराव !

बिहार में सत्तारूढ़ दल जदयू और भाजपा के बीच इस वक्त कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। अगर अच्छा चल रहा है तो आए दिन भाजपा के बयान बहादुर नेताओं का चेहरा बदलने वाला बयान आखिर क्यों लगातार आ रहा है।

पहले नेताओं ने जो बयान दिए वो है ही अब भाजपा के नोखा से पूर्व विधायक रामेश्वर चौरासिया ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आड़े हाथ लेते हुए कहा है कि लोग एक ही चेहरे को देख-देख कर ऊब गए हैं ऐसे में बिहार को भी नए चेहरे की जरूरत है।

वहीं दूसरी तरफ चौरसिया का नीतीश पर तंज के बाद जदयू नेता केसी त्यागी ने चौरसिया के जवाब में कहा कि ‘कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें परखा जाता है, स्वीकार किया जाता है और वे करिश्माई होते हैं। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी, कर्पूरी ठाकुर, नीतीश कुमार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे कई नाम इस श्रेणी में आते हैं। हमें नहीं लगता कि चेहरे को बदलने की आवश्यकता है।’आगे त्यागी ने ये भी कहा कि ‘ऐसी मांग करने की बजाय भाजपा को अपने सहयोगियों को साथ लेकर चलना चाहिए। उसे यह भी याद करना चाहिए कि झारखंड में आजसू जैसे गठबंधन सहयोगियों को दरकिनार करने का नतीजा रहा कि झारखंड में भाजपा सत्ता से बेदखल हो गई।

बिहार की राजनीति में पिछले 15 वर्षों से नीतीश सरकार सत्तारुढ़ है। बिहार को विकास की लौ से परिचित कराने का श्रेय भी इन्हें दिया जाता है। विकास के मामले में इनके ऊपर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। 15 वर्षों के कार्यकाल में केवल 20 माह राजद के साथ तो अधिकांशतः भाजपा के साथ सत्ता में बने रहे। राजद के साथ भी रहकर नीतीश सरकार के बिहार के विकास से इंकार नहीं किया जा सकता है। अगर भाजपा स्वयं से अपनी पीठ थपथपाने में लगी हुई है तो बात अलग है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो भाजपा ने अंदरुनी तरीके से मुख्यमंत्री के दावेदार को मानकर राजेंद्र सिंह को मैदान में उतारा था, मगर अफसोस की जनाब खुद की ही सीट नहीं निकाल सके। अब ऐसी स्थिति में एनडीए के बयान बहादुरों को अपनी जुबान पर कंट्रोल रखनी चाहिए ताकि बिहार की आगामी विधानसभा चुनाव में पुनः सत्ता नीतीश कुमार के नेतृत्व में बची रह सके। हलांकि बिहार की जनता की पहली पसंद विकास पुरुष नीतीश कुमार ही माने जा रहे हैं। भाजपा को महाराष्ट्र में हुए चुनाव के बाद सत्ता संभालने में अगर थोड़ी सी लोच आयी होती तो शायद महाराष्ट्र में भी भाजपा का अक्खा राज होता। झारखंड में जहां चेहरा बदलने की आवाज उठी वहां अपने नेताओं को ही बाहर किया जाने लगा। जिसका साफ असर आपको देखने को मिल रहा है। आपको याद दिला दें कि वर्ष 2017 में गुजरात में काबिज होने के बाद भाजपा कोई भी स्टेट अकेले नहीं जीत पायी है। नतीजा उसे किसी के सहारे ही सरकार बनानी पड़ी है। इन सारे तथ्यों को दीगर करते हुए भाजपा को अपने मूल पर आना होगा और इस तरह की ओछी बयानबाजी से बचते हुए अपने शीर्ष नेतृत्व के निर्णय पर ही कदम उठाना चाहिए।

बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है बिहार एनडीए में विवाद पनपता जा रहा है। जहां बिहार में भाजपा-जदयू-लोजपा साथ-साथ है वहीं झारखंड में ये तीनों अलग होकर ताल ठोकने का नतीजा चारो खाना चीत हो गए। इसलिए बिहार की सत्ता में बिना विमर्श के उठाए गए कदम का खामियाजा कहीं झारखंड की तरह पुनरावृति न हो इसका ख्याल रखना होगा। वैसे बिहार महागठबंधन में भी अंदरुनी कलह उसके विरासत पर सवाल खड़ा कर देता है। राजद, कांग्रेस, वीआईपी, रालोसपा यदि साथ-साथ हैं तो वाम दल अपना अलग राग अलाप रहा है। जबकि हम के जीतन राम मांझ मुस्लिम और दलित का कंबिनेशन बनाकर ओवैसी के साथ अगली पारी की शुरुआत करने जा रहे हैं।

सीएए और एनआरसी जैसे अहम मुद्दों पर बिहार में भी विवाद पनपने लगा है। सत्तारुढ दल में भाजपा सीएए और एनआरसी के पक्ष में है वहीं जदयू और लोजपा सीएए पर तो साथ हैं मगर एनआरसी पर भाजपा से बिल्कुल जुदा राय है। वहीं जदयू नेता प्रशांत किशोर अब कांग्रेस को नसीहत दे रहे हैं कि उसे कांग्रेस शासित प्रदेशों में एनआरसी का विरोध करना चाहिए। जबकि बिहार में महागठबंधन के साथ-साथ हम और वाम भी इन दोनों मुदों का विरोध कर रही है।

महाराष्ट्र और झारखंड के हाथ से जाने के बाद भाजपा जहां कदम फूंककर चलने की बात सोच रही है वहीं अन्य पार्टियों के हौसले बुलंद हुए हैं। केंद्रीय नेतृत्व में भाजपा की धूम है तो है तो स्टेट में लगातार ग्राफ गिरता जा रहा है। बिहार में नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं जो काफी सधे हुए कदमों से राजनीतिक चाल चलते हैं, इनका सोच समझकर बोलना भी इनके राजनीति कुशलता का परिचायक है। इस तरह बिहार के चाहे किसी भी दल के नेता हों जो सत्ता में है उन्हें संयमित होना चाहिए तो महागठबंधन को हर कदम फूंक फूंककर उठाना होगा।

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