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शाहीन बाग़ ने इन मुसलमान ‘महिलाओं को दी है नई उड़ान’

[: शाहीन उस चिड़िया का नाम है जो बहुत ऊंचाई पर उड़ती है और अपने शिकार को उड़ते हुए खाती है.”
सलेटी रंग के हिजाब में खड़ी एक महिला ने ये कहा. उनके बगल में खड़े एक युवक ने कहा कि इस जगह का नाम एक डॉक्टर की बेटी के नाम पर रखा गया था.
शाहीन सफ़ेद बाज़ का फ़ारसी नाम है, जिसे एक ग़ैर-प्रवासी पक्षी माना जाता है. इस शब्द का एक और मतलब दृढ़ निश्चय भी होता है.
75 साल की नूर-उन-निसां कहती हैं, “ये हमारे उड़ने का समय है. हम शाहीन हैं.”
ये सभी लोग दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाक़े का अर्थ समझा जा रहे थे. यह वो जगह है जहां पर कई दिनों से महिलाएं मोदी सरकार के नए नागरिकता क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रही हैं.
मानचित्र की शब्दावली में यह जगह दिल्ली के नक़्शे पर एक बिंदी जितनी है. इस ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर किसी की नज़र नहीं है. यमुना के किनारे इसका अधिकतर हिस्सा दिल्ली और नोएडा के बीच में आड़ा-टेढ़ा है. लेकिन ऐसा कम ही होता है कि एक नक़्शा भौतिक सीमा को दर्शाता हो. अक्सर नक़्शे फ़ंतासी, ख़्वाबों और पुरानी यादों की ज़मीन पर बनते हैं.

किसी ने कभी लिखा था कि नक़्शे के जिन हिस्सों को हम नहीं जानते या नहीं समझ पाते, उन्हें एक नक़्शा बनाने वालों की भाषा में ‘स्लीपिंग ब्यूटीज़’ कहा जाता है.
दिल्ली का शाहीन बाग़ भी ऐसा ही एक इलाक़ा है. ये इलाक़ा पिछले तीन सप्ताह में विरोध का प्रतीक बन गया है, जिसने सभी मान्यताओं को तोड़ दिया है और जिसने सभी को चौंका दिया है.
एक दोस्त ने पूछा, “प्रदर्शन कहां हो रहे हैं?” मैंने लिखा, “शाहीन बाग़”. फिर उसके बाद कोई जवाब नहीं आया.
मैप पर जब आप शाहीन बाग़ टाइप करते हैं तो वो रास्ता जामिया से होते जाता है. कुछ ही लोग उस रास्ते से जाना चाहते हैं. वहां पर उस दिन की कई ख़ौफ़नाक कहानियां मौजूद हैं.
शाहीन बाग़ में कई गलियां, बाहर निकलने के रास्ते, लटके हुए तार, एक-दूसरे से सटी इमारतें, कैफ़े, सलून, चाय और कबाब की दुकानों के अलावा बहुत सारा साहस भी है.
संविधान को बदलने के ख़िलाफ़ यहां महिलाएं और बच्चे दिल्ली की सर्द रात में मौन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इन महिलाओं में 90 और 82 साल की महिलाएं भी शामिल हैं.
यहां एक ऐसा पुरुष भी है जो पहले दिन से भूख हड़ताल पर है और अब उनकी ज़िंदगी बचान के लिए उन्हें ड्रिप चढ़ाई गई है. उनके बगल में मौजूद महिला ने एक सप्ताह बाद भूख हड़ताल शुरू की थी.
यह प्रदर्शन जब से शुरू हुआ है तब से ज़िंदगी का एक नया पहलू देखने को मिल रहा है. इसे एक सामुदायिक जीवन कहा जा सकता है.
शायद किसी को उम्मीद नहीं थी कि ‘नाज़ुक औरतों’ का प्रदर्शन नुमाइंदगी करने लगेगा. इन साधारण औरतों में जेल में डाल देने को लेकर एक असाधारण डर बैठ गया है.
15 दिसंबर को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों पर पुलिस ज़्यादती को सुनकर और देखकर जामिया नगर, बाटला हाउस और शाहीन बाग़ की चार महिलाएं और छह पुरुष अपने घरों से निकले थे.

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