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राज ठाकरे क्या बीजेपी के क़रीब आ रहे हैं?

: राज ठाकरे क्या बीजेपी के क़रीब आ रहे हैं?
बाला नंदगांवकर और नितिन सरदेसाई जैसे एमएनएस नेताओं ने पिछले दिनों मीडिया में बात करते हुए ऐसे संकेत भी दिए हैं.
उन्होंने कहा है कि गठन के 12 साल बाद ‘एमएनएस में कुछ आधारभूत परिवर्तन करने की ज़रूरत है’ और ‘राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता.’
बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन टूटने के बाद एमएनएस ने नासिक कॉर्पोरेशन के मेयर पद के चुनाव के लिए बीजेपी को वोट किया.
कुछ दिन पहले बीजेपी नेता आशीष शेलार राज ठाकरे से मिले भी थे.
इन सभी बयानों और जानकारियों के आधार पर नए राजनीति समीकरणों की अटकलें लगाई जा रही हैं.
बीबीसी से बातचीत में एमएनएस नेता संदीप देशपांडे ने कहा, “नंदगांवकर ने सही कहा है. राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन या स्थायी दोस्त नहीं होता.
हमने ये महाराष्ट्र में भी देखा है और राष्ट्रीय राजनीति में भी. कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी साथ आई. हमने महाराष्ट्र में शिवसेना और कांग्रेस को साथ आते देखा. हमारी पार्टी जो भी फ़ैसला लेगी, राज साहेब उसके बारे में सबको बताएंगे.”
इससे ये बात तो साफ़ हो गई है कि एमएनएस ने अपने सारे विकल्प खुले रखे हैं और वो बीजेपी के साथ गठबंधन करने की संभावनाओं से इनकार नहीं कर रही है.
बीजेपी के साथ जाने के साथ ही, एमएनएस हिंदुत्व की ओर रुख़ कर सकती है.
ये भी कहा जा रहा है कि इस बदलाव की कड़ी में एमएनएस के झंडे में भी बदलाव किए जा सकते हैं और नीले, भगवा और हरे रंग की जगह झंडे को पूरा भगवा किया जा सकता है.
हालांकि कोई भी एमएनएस नेता इसके बारे में आधिकारिक रूप से नहीं बता रहा है. लेकिन एमएनएस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से तीन रंगों वाला झंडा हटा दिया गया है.
वहां अब सिर्फ़ पार्टी का चुनाव चिह्न – ‘रेलवे इंजन’ ही दिख रहा है.
कहा जा रहा है कि पार्टी के नए झंडे में भगवा रंग के साथ ही शिवाजी महाराज की राजमुद्रा भी होगी.
शिवसेना महा विकास अघाड़ी में शामिल हो गई है, ऐसे में एमएनएस बीजेपी और हिंदुत्व के ज़रिए नई राजनीतिक संभावनाओं को तलाशने की कोशिश कर रही है.
कहा जा रहा है कि एमएनएस राजनीतिक रुख़ बदलकर ख़ुद को शिवसेना के विकल्प के तौर पर पेश करेगी.
ये संभावना सच्चाई में बदलती हुई दिख रही है. संभावना दो मुद्दों पर आधारित है. एक शिव सेना का हिंदुत्व.
कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिलाने के बाद शिवसेना को आक्रामक हिंदुत्व से किनारा करना होगा.
उन्होंने कई मसलों पर अपने रुख़ को नरम किया है. एमएनएस उन मतदाताओं और कार्यकर्ताओं को आकर्षित करने की कोशिश करेगी, जो हिंदुत्व की वजह से शिवसेना के साथ थे, लेकिन अब उसके बदले रुख़ की वजह से ख़ुश नहीं हैं.
राज ठाकरे हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने हिंदुत्व को छोड़ा नहीं है और उन्होंने ये भी साफ़ किया था कि एमएनएस के झंडे में भगवा रंग हिंदुत्व को दर्शाता है.
अब लग रहा है कि एमएनएस हिंदुत्व के मुद्दे पर आक्रामकता दिखाएगी और इस मामले में शिवसेना से भी आगे निकल जाएगी.
दूसरा, एमएनएस बीजेपी की सहयोगी बन सकती है क्योंकि शिवसेना के जाने से ये जगह ख़ाली हो गई है.
बीजेपी को भी शिवसेना का मुक़ाबला करने के लिए एक दोस्त की ज़रूरत है. दूसरी ओर, एमएनएस को लागतार नाकामी मिल रही है, इसलिए वो एक दोस्त की तलाश भी कर रही हैं.
लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार किया, जिससे कांग्रेस और एनसीपी को फ़ायदा मिला.
समझा जा रहा था कि विधानसभा चुनाव में वो कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन में शामिल हो जाएगी. एमएनएस उस गठबंधन के साथ नहीं गई, लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में उन्होंने एक दूसरे का समर्थन किया.
राज ठाकरे की शरद पवार से बढ़ती नज़दीकी ने भी राजनीतिक पंडितों को सोचने का मौक़ा दिया था. एक वक़्त उनकी बीजेपी नेताओं से भी नज़दीकी बढ़ी थी, जिसने राजनीतिक चर्चा शुरू की. लेकिन उस वक्त शिव सेना बीजेपी के साथ थी.
अब, एमएनएस के पास एक राजनीतिक दोस्त बनाने का मौक़ा है. बीजेपी के पास 105 विधायक हैं और ये पार्टी केंद्र में भी है. ऐसे में अगर एमएनएस बीजेपी को अपना सहयोगी बनाती है तो उसे संगठन के तौर पर भी मज़बूती मिलेगी.

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