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बजट 2020: दूध और डेयरी सेक्टर पर उचित नीतियां बनाये सरकार, तभी मिलेगा फायदा

: आगामी बजट में सरकार को दूध और डेयरी सेक्टर के बारे में सोचना चाहिए, ताकि किसानों को लाभ मिल सके। किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला से बातचीत करते हुए कह कि हाल ही में दूध के बढ़ते दामों से चिंतित केंद्र सरकार के पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने देश में दूध के उत्पादन, उपलब्धता और बढ़ती कीमतों के आंकलन के लिए जनवरी के शुरू में सभी प्रमुख डेरियों की एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में आगामी बजट के मद्देनजर दुग्ध उत्पादन और डेयरी उद्योग की समस्याओं और प्रस्तावों पर विस्तृत चर्चा की गईइस बैठक में निजी क्षेत्र की डेरियों ने दूध पाउडर आयात करने की गुहार सरकार से लगाई। जबकि वास्तविकता यह है कि ना तो देश में दूध की कमी है और ना ही दूध के रेट इतने बढ़े हैं कि दूध उत्पादों का आयात खोलकर हम किसानों की कमर तोड़ दें। वास्तविकता तो यह है कि दूध के दाम पांच सालों तक घाटे में चलते रहे। अब जाकर उनमें कुछ सुधार हुआ है। निजी डेयरियां केवल अपना मुनाफा देख रही हैं। पिछले पांच सालों में किसानों को दूध में बहुत घाटा झेलना पड़ा तब तो ये चुप थे। दूध पाउडर का दाम अब जाकर उस स्तर पर पहुंचा है जहाँ वह चार साल पहले था। अतः दुग्ध उत्पादों का आयात करने का कोई कारण नहीं है।

पिछले दिनों डेरियों ने दूध के दाम दो से तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ाए थे। यह पिछले सात महीनों के भीतर दूध की कीमतों में दूसरी बढ़ोतरी थी। इस साल मई में भी दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम दो रुपये प्रति लीटर बढ़ाए गए थे। दूध के दाम बढ़ने के कारणों का विश्लेषण करने के लिए दूध की पिछले दस सालों की कीमतों और सरकारी नीतियों का आंकलन करना होगा।

फरवरी 2010 में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम 30 रुपये प्रति लीटर थे, जो मई 2014 में बढ़कर 48 रुपये प्रति लीटर हो गए। इस अवधि में उपभोक्ताओं के लिए दूध के मौद्रिक दाम औसतन 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़े। मोदी सरकार के पांच सालों के कार्यकाल में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम मई 2014 में 48 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर मई 2019 में 53 रुपए प्रति लीटर पर पहुंचे। इस अवधि में उपभोक्ताओं के लिए दूध के मौद्रिक दाम औसतन 2.1 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़े। इस अवधि में 3.3 प्रतिशत की औसत उपभोक्ता खाद्य महंगाई दर को देखते हुए दूध के वास्तविक दाम घट गए थे।

दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत और खाद्य महंगाई दर को समायोजित करने के लिए इस अवधि में दूध के दाम कम से कम 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की मामूली मौद्रिक दर से भी बढ़ाये जाते तो भी मई 2019 में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम लगभग 65 रुपये प्रति लीटर होते। जबकि 15 दिसंबर को हुई बढ़ोतरी के बाद भी फुल-क्रीम दूध के दाम यहां 55 रुपये प्रति लीटर ही हैं। यानी दूध के दामों में हुई हालिया बढ़ोतरी के बावजूद उपभोक्ताओं को दूध अब भी वाज़िब दामों से लगभग 10 रुपये प्रति लीटर सस्ता मिल रहा है।

शुक्र है कि दूध के क्षेत्र में सक्रिय अमूल जैसी सहकारी डेरियों के कारण एक तरफ तो उपभोक्ताओं को दूध के बहुत अधिक दाम नहीं चुकाने पड़ते, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ताओं द्वारा दूध पर खर्च किये गए एक रुपये में से लगभग 75 पैसे किसानों तक पहुंचते हैं। किसान अपने उपयोग के बाद लगभग 10 करोड़ टन दूध प्रति वर्ष बेच देते हैं। दूध के दाम 10 रुपये प्रति लीटर कम मिलने के कारण देश का दुग्ध उत्पादक किसान लगभग एक लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष का घाटा अब भी सह रहे है।

सहकारी क्षेत्र की डेरियां किसानों के अपने उपक्रम हैं जिनको मिला लाभ लाभांश के रूप में किसानों तक पहुंचता है। पिछले साल सरकार ने कॉर्पोरेट कंपनियों के इनकम टैक्स को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया था, परन्तु किसानों की इन सहकारी संस्थाओं पर टैक्स पहले की तरह ही लग रहा है जो किसानों के साथ अन्याय है जिसे तत्काल कम किया जाना चाहिए। इसी प्रकार दुग्ध उत्पादों पर से जीएसटी भी कम किया जाना चाहिए ताकि कम टैक्स का लाभ सीधे किसानों तक पहुंच सके।

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