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फांसी के फंदे बिहार के बक्सर जेल में ही क्यों बनाए जाते हैं

[: भारतीय क़ानून के अनुसार फांसी किस अपराध की सजा है? जवाब होगा कि क्रूरतम और जघन्यतम अपराधों के लिए विरल में विरले मिलने वाली सजा है फांसी.
जिस तरह फांसी की सजा विरले ही किसी को मिलती है, उसी तरह फांसी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फंदा भी पूरे देश में केवल एक ही जगह बनता है.
गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे से लेकर मुंबई बम धमाकों के दोषी अजमल कसाब और संसद पर हमले के दोषी अफ़जल गुरु को दी गई सभी फांसियों में इस्तेमाल किए गए फांसी के फंदे बक्सर के सेंट्रल जेल में बनाए गए.
हाल ही में जब ये ख़बर आयी कि बक्सर जेल प्रशासन को एक बार फिर से 10 फांसी के फंदे बनाने के ऑर्डर मिले हैं, तब से बक्सर जेल एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है.
बक्सर जेल प्रशासन को फांसी का फंदा बनाने के लिए ऑर्डर किसको फांसी पर लटकाने के लिए मिला है?
इसे लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. जहां तक रिकॉर्ड्स की बात है तो एनसीआरबी के अनुसार अभी तक 21 लोगों को फांसी पर लटकाया जा चुका है. करीब 1500 लोगों को फांसी की सजा सुनायी जा चुकी है.
लेकिन सवाल ये कि आख़िर हर बार फांसी के फंदे बक्सर सेंट्रल जेल में ही क्यों बनते हैं? क्या कहीं और ऐसे फंदे नहीं बनाए जा सकते?
बक्सर जेल के सुपरिटेंडेंट विजय कुमार अरोड़ा बीबीसी से कहते हैं, “क्योंकि इंडियन फैक्ट्री लॉ के हिसाब से बक्सर सेंट्रल जेल को छोड़ बाकी सभी दूसरी जगहों पर फांसी के फंदे बनाने पर प्रतिबंध है. पूरे भारत में इसके लिए केवल एक ही जगह पर मशीन लगाई गई है और वो सेंट्रल जेल बक्सर में. और ये आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के समय से है.”
सुपरिटेंडेंट विजय कुमार अरोड़ा बताते हैं कि पूरे देश में कहीं भी फांसी हो, फंदा बक्सर जेल में ही बनाया जाता है.

बक्सर जेल में ही क्यों बनाए जाते हैं फंदे

लेकिन अंग्रेजों ने ये मशीन यहीं पर ही क्यों लगायी? बाद में भारत के अन्य जगहों पर भी तो लगाया जा सकता था?
जेल सुपरिटेंजेंट अरोड़ा कहते हैं, “ये तो वही बता सकते हैं कि उन्होंने यहीं क्यों लगायी. मेरी जो समझ है और जो मैंने यहां आकर जाना है उसके आधार पर इतना जरूर कहूंगा कि यहां के क्लाइमेट का इसमें अहम रोल है.”
“बक्सर सेंट्रल जेल गंगा के किनारे है. फांसी का फंदा बनाने वाली रस्सी बहुत मुलायम होती है. उसमें प्रयोग किए जाने वाले सूत को अधिक नमी की ज़रूरत होती है. हो सकता है कि गंगा के किनारे होने के कारण ही मशीन यहीं लगायी गयी. हालांकि अब सूत को मुलायम और नम करने की जरूरत नहीं पड़ती. सप्लायर्स रेडिमेड सूत ही सप्लाई करते हैं.”
बक्सर जेल से मिली जानकारी के अनुसार आखिरी बार फांसी का फंदा 2016 में पटियाला जेल को सप्लाई किया गया था. उसके पहले 2015 में 30 जुलाई को 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के दोषी याकुब मेमन के लिए फांसी का फंदा यहीं से बनकर गया था.
फांसी के फंदे बनाने के लिए बक्सर जेल में कर्मचारियों के पद सृजित हैं. वर्तमान में चार कर्मी इन पदों पर काम कर रहे हैं. जेलर सतीश कुमार सिंह बताते हैं कि कर्मी केवल निर्देशित करते हैं या प्रशिक्षित करते हैं. फांसी के फंदे बनाने का काम यहां के कैदी ही करते हैं.
सतीश कुमार सिंह कहते हैं, “यह काम यहां के कैदियों की परंपरा में शामिल हो गया है. जो पुराने कैदी हैं वो इस विधा को पहले से जानते हैं. और जो नए हैं वो देख-देख कर सीखते हैं. इसी तरह ये परंपरा चली आ रही है.”
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